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माफ़ कीजियेगा

माफ़ कीजियेगा इस पोस्ट के लिए थोड़ी बेहूदा भाषा में लिखी हुई है
लेकिन क्या फ़र्क़ पड़ता है मेरे लिखने से| Character Judgement तो दो मिनट में दे कर निकल लेंगे देश के राष्ट्रवादी गायक “अभिजीत” की तरह| मतलब अखंड बेहूदा इंसान है, इतना बेहूदा इंसान है ये कि इसकी बेहूदगी देख कर लगता है इसके माँ- बाप ने भी दो बार सोचा होगा- किया जाए या न किया जाए?
मतलब जिसने इतने सुरीले गाने गाये हो उसके दिमाग में इतना जहरीला कीड़ा कैसे पनप सकता है लेकिन इसको देख कर लगता है सुरीली आवाज़ उस वक़्त इसीलिए निकल रही थी क्योंकि कीड़ा बहुत छोटा था और अब बड़ा हो कर कहीं से बाहर निकलने की कोशिश में लगा हुआ है|
अब जरा बात करते हैं परेश रावल की| कहते हैं हैं जब अच्छा एक्टर/ कलाकार किसी किरदार में दिलोदिमाग से घुस जाता है वो वैसा ही बन जाता है और परेश रावल को देख कर लगता है इसने रेपिस्ट और भांड का किरदार बहुत दिल से निभाया था तभी आज ऐसे बोल निकल रहे हैं |
इसकी घटिया बात सुन कर लोग कह रहे हैं- गलती अरुंधति रॉय की है| जब वो ऐसा बोल सकती है तो परेश जी भी बोल सकते हैं उन्हें जीप में बांधने को|
तब मुझे लगता है अच्छा गधों के बच्चों, तो हमने परेश रावल को इसीलिए वोट दिया था ताकि वो किसी की भी बात पर उसको जीप से बांधने की वकालत करे| धन्य हो अच्छा है तुम सब गधों के बच्चें हो और हम बंदरों के|
जब गधों की बात की है तो नरेंद्र मोदी जो की सबसे बड़े गधे हैं मतलब हत्यारे गधे हैं उन्हें भूल नहीं सकती|
Manchester में 19 लोगो के मरने पर धड़धड़ कर के ट्विटर पर शोक व्यक्त कर दिया लेकिन खुद के यहाँ रोजाना लोग मर रहे हैं उसपे क्या हाथों में कोढ़ लग जाता हैं| हद घनचक्कर इंसान है अपना प्रधानमंत्री|
“मैंने बहुत बहुत बड़े लोगो से दुश्मनी मोल ली है|’
अरे भाई कौन हैं ये बड़े लोग? खुद तो गधे से प्रेरणा लेते हो और पूरी दुनिया को गधा बनाने में लगे हो| तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली आकर प्रदर्शन किया उस पर बोलने में मुँह में कनपुरिया पान चबा कर बैठे थे जो बोल नहीं सकते थे और वहां श्रीलंका में जाकर बकर बकर कर दिया तमिल किसानों पर| दे दो न तमिल श्रीलंका को जब श्रीलंका में ही जाकर बोलना था थारे को|
दिमाग का दही कर दिया है इस बतख पार्टी ने| शर्म करो बाबा कुछ तो शर्म करो|
मत करना वैसे वो भी जाने क्या बोल कर करोगे|

Strangers and life

Don’t make a distance from strangers”.
Since our birth till our death, we always surround by strangers and we keep making relations with those strangers as our parents, our relatives or friends.
Making friends is not a big deal but it takes a lot of courage to keep faith on a stranger. I did this brave work a lot of time.
When I went to the stranger city to complete my studies after 10th, it made afraid. However, I decided to make friends because it was hard to be alone for me. I tried my best to make someone my friend but it failed. In school, whenever I tried to talk people started talking about homework and Trigonometry. I hate that and I felt isolation.
Same thing happened in coaching where in the time period of 4 hours, I could never get 4 minutes to talk to anyone.
When I complained this to my parents that I ain’t able to study because I am alone.
“What do you need? You have enough books.”
“Friends will spoil you.”
“Keep studying”
Trust me, I was so alone and it was hard to survive there. Nobody should live alone and I was the nobody.
I couldn’t find and when I found some people it was hard to describe the situation. Although that was another story and soon will recite them.
But, please take care of yourself and your future generation. If someone doesn’t have friends it means there are some problems and you need to discuss it.
My two years were so bad that I could pray it should never happen with anyone else.

ज़िंदगी पढ़ पढ़ कर शुन्य हो जाएगी

“अजनबियों से दूर न रहें”
पैदा होने से लेकर मृत्यु तक हम अजनबियों से मिलते हैं, उन्हें समझते हैं और हर किसी से कोई रिश्ता जोड़ लेते हैं चाहे माँ-बाप का हो, रिश्तेदारों का हो या दोस्ती का हो| लोग चाहे माने या न माने, दोस्त बनाना मुश्किल नहीं है लेकिन दोस्ती शब्द पर यकीन करना और किसी अजनबी के साथ अपने एक नया रिश्ता जोड़ना एक बहुत ही साहसिक कदम होता है|
जो भी हो, मैंने ऐसे साहसिक कदम बहुतेरे बार उठाये थे| जब मैं पहली बार उस अजनबी शहर में गयी थी तब थोड़ा डर लगा था लेकिन कुछ दिनों में मैंने कि दोस्त तो बनाने ही पड़ेंगे नहीं तो ज़िंदगी पढ़ पढ़ कर शुन्य हो जाएगी| खैर जिस स्कूल में मैं पढ़ रही थी वहां मैं दोस्त चाह कर भी न बना सकी क्योंकि जब भी किसी से बात करने की कोशिश करती या तो वो Trigonamatry के questions लेकर बैठ जाते या फिर फिजिक्स का होमवर्क|
फिर दोस्त न होने की वजह से मेरा दिल भाग गया स्कूल से और मैं मानती हूँ वो मेरी गलती थी| लेकिन एक इंसान कब तक अकेले अकेले रहेगा| मेरे साथ भी यहीं हुआ|
सोचा स्कूल के दायरे से बाहर निकल कर दोस्त बनाते हैं| लेकिन Coaching में तो चार घंटे की क्लास में 4 मिनट भी बात नहीं करने देते थे| वहां भी स्कूल जैसी ही problem हो गयी थी|
जब मैंने अपने घरवालों को शिकायत की कि यहाँ तो कोई दोस्त ही नहीं बन रहा, मैं कैसे रहूंगी यहाँ?
“तो क्या बिना दोस्त के पढाई नहीं होती|”
“चुपचाप पढाई में दिमाग लगाओगी तो दोस्त याद नहीं आएंगे|”
“जितनी दोस्ती में पड़ोगी पढाई उतनी ख़राब होगी”|
यकीन मानिये मैं जितनी अकेली थी उससे ज्यादा दुनिया में कोई और नहीं होगा| शायद उन दो सालों में मेरे अंदर ही कुछ गलतियां होंगी जिससे स्कूल और coaching कहीं एक दोस्त नहीं बन पाया|
दोस्त बने लेकिन वो एक अलग कहानी है और अलग रस्ते पर है जो जल्द ही बताई जाएगी|
लेकिन एक बात ध्यान रखें- बिना रिश्ते संसार नहीं झेल सकते आप| बहुत कुछ खो देते हैं अकेले अकेले के चक्कर में| बच्चों को अगर बच्चें नहीं मिल रहे तो ये गौर करने की बात है कि आखिर समस्या क्या है?
वो दो साल बहुत कठिन थे, आप खुद को और अपने आने वाले generation को बचाइयेगा|

मेरा बेऔकाती सपना

करना वही चाहिए जो हमेशा आपका मन करें|
लेकिन हमेशा यह सत्य नहीं होता, कभी-कभी कुछ चीजे हमें जबरदस्ती में अच्छा लगने लगता है| सबसे बड़ा उदाहरण था जब मेरा अचानक से Roadies बनने का मन करने लगा और उसके दो साल बाद Neurologist बनने के सपने देखने लगी| अब बेटी जब गीता के पांच अध्याय संस्कृत में याद कर सकती है तो वह तो कुछ भी कर सकती है|
लेकिन गीता और science में जमीन-आसमान से भी ज्यादा का फ़र्क़ था|
उस अजनबी शहर के नामी coaching institute में मैं MBBS की तैयारी करने लगी| एक तो स्कूल में अलग से 11th और 12th की पढाई करो उसपे से एक और tuition पकड़ लो| ज़िंदगी में कुछ बचा ही नहीं था| एक दिहाड़ी मजदूर भी मेरे से कम काम करता होगा, मेरा क्या था सुबह 5 बजे जगो, 2 बजे दोपहर को वापस आओ और फिर चार बजे ट्यूशन जाओ और फिर 9 बजे वापस आओ, उसमे भी चैन नहीं आकर अपने उस बेऔकाती सपने को पूरा करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दो|

सच बता रही हूँ, मैं तब भी नहीं हारी थी| मैं जानती थी इतना आसान नहीं है ये लेकिन ये मेरे लिए भी नहीं है| मैंने रोया, बताया बुला लो वापस मुझसे नहीं होगा लेकिन पापा ने एक ही बात बोली थी- मुझे पता है तुमने गलत चीज़ चुन ली लेकिन अब ये लड़ाई तुम्हारी है, तुम्हे पूरा छूट है गलत होने का, हारने का लेकिन ये लड़ाई से वापस लौटने का कोई सवाल नहीं है|

मैं फिर उस दो तरफ़े लड़ाई में खड़ी हुई| फिर से पन्ने पलटे कुछ समझ नहीं आया और कोशिश की लेकिन कुछ नहीं आया समझ| आखिर Neurologist बनने के लिए क्यों मुझे Physics का Right hand thumb rule समझना जरुरी है ये आज तक समझ नहीं आया|

लेकिन स्कूल और कोचिंग का पहला एग्जाम आया और मुझे मेरे उम्मीदों के नक़्शे पर लाल निशान से जीरो पाया| मैं टूट गयी थी, रातों की नींद ख़राब कर के अंडा देखना मेरे पहले breakup से भी ज्यादा दर्दनाक था|
लेकिन अभी तो और निशान देखने बाकि थी सिर्फ एग्जाम के शीट पर नहीं कहीं मेरी ज़िंदगी और मेरी सोच पर भी|

मेरे पढ़ने-लिखने का आखिरी दिन

याद है वो दिन जब मैंने बाहरवीं का आखिरी पेपर दिया था, उस दिन मुझे लगा था ये मेरे पढ़ने-लिखने का आखिरी दिन है| आगे मुझसे कुछ नहीं होगा और ना ही मेरे माँ- बाप को कोई उम्मीद बची है मुझसे|
मुझे याद है मैथ्स का पेपर आखिरी पेपर था और question पेपर मिलने के एक घंटे में मैं पेन बंद कर के बैठ गयी थी| जब invigilator मुझसे पूछने आयी- क्या हुआ? सारे Questions लिख लिए क्या?

मैंने भी सच बोला- “Yes Ma’am, सारे questions लिख दिए| ” अब questions ही उतारे थे मैंने क्योंकि जवाब तो आता नहीं था किसी का| अंडा से ज्यादा की कोई उम्मीद नहीं थी|
बगल में बैठा, मेरी शक्लें ताड़ रहा था- ये ले पेपर, लिख लो कुछ| अब भाई कुछ पढ़ा हुआ हो तभी तो लिखूं, ऐसे भी पुरे question पेपर में मुझे वो Cone और Rectangle बनाने की वजह समझ नहीं आ रही थी|
मैंने समय बर्बाद करने के लिए फिर से questions उतार लिए थे|
एग्जाम खत्म हो चूका था और मेरी मुझसे आगे बढ़ने की उम्मीद! सारे बच्चे खुश थे और मैं उन सबको एक कोने से देख रही थी| सामने जाने में शर्म आ रही थी लेकिन मुझे पता था कोई इतनी जहमत भी नहीं उठाएगा मुझसे पूछने कि| बात ही कहाँ किया था मैंने उन दो सालों में किसी से|
उस दिन की उदासी सिर्फ उदासी नहीं थी, उसमें कही आगे न पढ़ पाने का दुःख भी था, कुछ आगे न कर पाने का दुःख था, किसी अच्छे कॉलेज में पढ़ने का रास्ता बंद होता दीख रहा था| आखिर कितनी गलतियां की थी मैंने उन दो सालों में|

Confession-1