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चोरी की इश्क़-3

“अच्छा ठीक है, अब नहीं मिलेंगे उससे। ख़ुश? अब ढोल ना पीटने लगना घर में।”, सुगम धीरे धीरे खेत में उतरने लगा।

खेतों से प्यार था उसको। जब दिसम्बर के ठंड में धान की कटाई होती थी तो पुवाल से बने हुए पहाड़ पर चढ़ना बहुत अच्छा लगता था। दिनाक को हमेशा हरा दिया करता था।

एक बार उसने घर पर पहाड़ बनाने के लिए बापू को बोला था लेकिन बापू को मालिक से पुवाल लाने की इजाज़त नहीं मिली।

मन ममोस कर रह गया सुगम।

ख़ैर अब तो वो पुवाल ख़रीद सकता है अगर चाहे तो लेकिन अब प्यार पुवाल नहीं था। पता नहीं था कि क्या था।

तुम तो कह रहे थे, हम हाथ नहीं पकड़ेंगे? लेकिन तुम तो गले पकड़ लिए भाई साहब। बहुत आगे चला गया है बात। – दिनाक ने चुटकी लेते हुई बात बोली।

अब मैं इस बारे में कुछ नहीं बोलूँगा। जो बताना था बता दिया और तुमने देख लिया। तुम पर बहुत भरोसा है, दिनाक। मैं ऐसा कुछ नहीं होने दूँगा जिससे तू मेरा साथ देने में कभी क़तरा जाए। सुगम ने आँखों में आँखे डाल कर बोला।

हमको तुम्हारा सर्टिफ़िकेट नहीं चाहिए रे। हम अपने दोस्त को बहुत कुछ छोड़ते देखें हैं जिससे वो बहुत प्यार करता था। चाहे कुछ भी हो थोड़ी चोरी तो “इश्क़ में चलती ही है”। दिनाक ने सुगम को पेट में गुदगुदाते हुए बोला।

चल आजा देखते हैं आज कौन घर तक पहुँचता है, आजा दिनाक।

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चोरी की इश्क़- 2

“कैसी हो”, सुगम ने आगे बढ़ कर पूछा।

दिनाक सुगम के पीछे ही खड़ा रहा। अपने पैर के उँगलियों की तरफ़ देख रहा था। बड़े गाँव वालों के सामने आकर बात नहीं की थी उसने कभी।

“मैं तो बहुत अच्छी हूँ। तुम बताओ? कब वापस जा रहे कॉलेज? मैंने सोचा पास में ही हो तो मिल लेते हैं।”, राशि एक अलग ही ख़ुशी में थी।

“हाँ, मैडम को पाँच किलोमीटर पास लगता है”, दिनाक ने दूसरी तरफ़ मुँह करके बुदबुदाया।

“सुगम, ये तुम्हारे दोस्त हैं क्या?”, राशि ने सुगम के कंधों के ऊपर से देखा।

“हेलो, मैं राशि, आप?”

“राशि ये है दिनाक, मतलब दिनांक।”

राशि ने हाथ आगे बढ़ाया। दिनाक ने हाथ जोड़ कर नमस्ते किया। छुएगा कैसे भाई। आज तक इधर आकर कभी मुँह नहीं देखा किसी का। पता नहीं ये लड़का क्या कर रहा है।

“आप बस सुगम कब जा रहा ये जानने के लिए बुलाया?” दिनाक ने सर हिलाते हुए पूछा।

“नहीं, मतलब मैं तो बस मिलना चाहती थी। घर नहीं बुला सकती। तुम्हारे घर जा सकते हैं क्या?” बड़े सहजता से पूछा सुगम के तरफ़ देख कर।

“नहीं कैसे जा सकती? हमारे घर नहीं जा सकती।” दिनाक ने सुगम के कमर में चींटी काटते हुए बोला।

“अच्छा ठीक है। मैं महीने के आख़िरी हफ़्ते में निकलूँगी। तुम बताना मुझे। मैं जा रही हूँ।”

“राशि, एक मिनट।”

सुगम ने राशि को गले लगाया।

अबे, क्या कर रहा यार। – दिनाक ने सुगम की बेल्ट खिंचने की कोशिश की।

“अच्छा बाय! जल्दी मिलती हूँ।”

सुगम एक टक लगा कर देखने लगा। दिनाक मुँह बाये खड़ा रहा।

प्यार हो गया है तुमको, सुग़मा। ये ठीक नहीं कर रहे हो तुम। हम बता रहे हैं।, दिनाक जल्दी जल्दी पगडंडियों पे जाने की कोशिश करने लगा। भागना था उसको उस मनहूस जगह से।

जहाँ ग़ुलामी की बदबू हो वहाँ प्यार कैसे पैदा हो सकता है। शहर जाकर बुद्धि में अकाल पड़ गया है। दिनाक के दिलोदिमाग़ में क़हर बरपा हुआ था।

सुगम जल्दी जल्दी भाग कर दिनाक को पकड़ने की कोशिश करने लगा।

तुमको पता नहीं है, वो बहुत अच्छी है। हमारे बीच सब अच्छा चल रहा है। तुम्हीं हो जिसको ये सब पता है। तुम मत बताना किसी को। सुगम ने आगे आकर दिनाक का रास्ता रोक लिया।

ठीक है, नहीं बताते हैं। फिर पाँच साल बाद तुम्हारे बाप इसके यहाँ इसकी शादी का टेंट लगाने जायेंगे। फिर तुम बताना हमको की कैसा लग रहा है। क्या किया तुमने ये? कुछ नहीं है तुम्हारा और उसका, आगे। काहे अपना काम नहीं कर रहे।, दिनाक ने सुगम का हाथ पकड़ कर बोला।

“नहीं करेगी वो शादी। हम बस पसंद करते हैं। बहुत प्रैक्टिकल लड़की है। जानते है कि हम शादी नहीं कर सकते।”

सुगम ने हँसते हुए हाथ छुड़ाया।

“अच्छा प्रैक्टिकल करने आयी थी यहाँ? इतनी दूर रिक्स लेकर आए हम लोग और तुम प्रैक्टिकल लड़की बोल रहे।” दिनाक को ग़ुस्सा सा चढने लगा था।

चोरी की इश्क़

चोरी की इश्क़- 1

“कहाँ चले जा रहे हैं हम”, दिनाक ने अपनी चप्पल रगड़ते हुए पूछा।

एकदम नयी चप्पल ली थी उसने दो महीने पहले, चकाचक और मुलायम। कहाँ इतनी रगड़ खाती हुई घसीटी जा रही थी।

“चलो तो यार, मैं अकेले नहीं जा सकता। किसी से मिलना है।”, सुगम बोलते बोलते मुस्कुरा पड़ा।

छब्बीस से ज़्यादा की उम्र नहीं थी उसकी। बहुत तेज़तर्रार दिमाग़ और उम्र से ज़्यादा का ज्ञान, दोनों की कोई कमी नहीं थी सुगम में।

“काँट हल गया है पैर में हमारे और तुम दौड़ाये चले जा रहे हो यार”, दिनाक ने चप्पल हाथ लेते हुए बोला। काँटा लगने का ग़म पैर से ज़्यादा चप्पल में लगने का था।

“हम नहीं जाएँगे अब। पहले बताओ लेकर कहाँ जा रहे हो। अनाधुन भागे जा रहे। कौन मंत्री है का?”, मुँह बिचकाते हाथ हिलाते अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की।

“नहीं एक लड़की है।” दूसरे दिशा में देखते हुए सुगम ने सच्चाई बतायी। मुँह लाल हो रहा था। पता नहीं चल रहा था की भागने के वजह से लाल हुआ पड़ा है लड़की के नाम से।

“कौन है रे? गाँव की है? बाहर की है? सुंदर है का? घर में बताया की नहीं? नहीं बताया होगा तुम और साथ में अब हमको भी पिटवा दोगे!”, दिनाक ने चप्पल पकड़े हाथ को सर पर रख लिया।

“राशि नाम है। बड़े गाँव की है। कॉलेज में साथ पढ़ते हैं ना।” सुगम ने बड़ी ख़ुशी के साथ बताया।

“तुम पागल हो क्या? मरोगे तुम। बड़े गाँव की लड़की से मिलने जा रहे हो ? साथ में पढ़ते हो तो साथ में बच्चों का नाम भी सोच लिए क्या? दिमाग़ बचा है की नहीं?”

अब तो दिनाक की शक्ल उसके चप्पल के टेढ़े फ़ीते की तरह हो गयी थी।

“नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है। वो हमें बहुत पसंद करती हैं। उनको सब पता है हमारे गाँव और उनके क़द के बारे में। जब वो ठीक हैं तो मैं कैसे मना कर देता।”,

आँखें झुका कर सुगम ने बोला। काली घनघोर आँखों में एक चमक थी जो दिनाक को दिख गयी थी।

“मना कैसे करते हैं पता ही नहीं भाई को। दसवीं के एग्ज़ाम में पूछ रहे थे तो मुँह टेढ़ा कर के मना कर दिए थे। अब लड़की है तो कैसे मना करें। चलो हम भी तो देखें कौन है ये लड़की जिसने राशि बिगाड़ दी हमारे लड़के की।” सुगम का कंधा झकझोरते हुए दिनाक ने बोला।

अब पगडंडियाँ ख़त्म हो रही थी। कुवाँ आगया। रास्ता ख़त्म। इसके बाद पक्की सड़क थी जो बड़ा गाँव जा रही थी। सुगम और दिनाक बचपन में इस रास्ते अपने माँ के साथ बड़े गाँव जाया करते थे। माँ बर्तन झाड़ू पोंछा करती थी और बाप बँटाई की ज़मीन पर काम।

ख़ैर वो सब पुरानी बात थी लेकिन आज दोनों उस रास्ते बड़े गाँव के एक लड़की से मिलने जा रहे थे जो सुगम के साथ ही कॉलेज में पढ़ाई कर रही थी। यहाँ कोई किसी का मालिक नहीं था।

“तुम का सड़क के बीच में मिलोगे। ये तुम्हारा कॉलेज नहीं है जो जहाँ मन किया खड़े होकर बकैती काटने लगे। यही के यही काट देंगे ये लोग अगर कौनो देख लिया तो।” दिनाक ने अपनी नज़र बाज़ की तरह चारों दिशा में घुमा दी।

“मैं कौन सा हाथ पकड़ रहा हूँ यार। बात ही तो करनी है।” सुगम ने माथे से गिर रही पसीने के धार को हाथ से हटाया।

धूप ज़्यादा थी लेकिन राशि के इंतज़ार में धूप भी अच्छी लगने लगी थी। क्यूँ अच्छी लगने लगी है, इसका जवाब वो ख़ुद को देना नहीं चाहता था। राशि बहुत अच्छी थी, हमेशा पटर-पटर बोलना और हँसना वो भी ज़ोर से।

आख़िरी बार जब काफ़ी हाउस में राशि का इंतज़ार कर रहा था तो राशि ने इतने तेज़ आवाज़ में उसे डराया की उसके मुँह से चीख़ निकल गयी थी।

“सुग़मा, क्या सोच रहा है बे। एके तरफ़ देखे जा रहा। जिन्न है का जो इतना ग़ौर से देखना पड़ रहा है तुमको। देखो, दो बज रहे हैं अभी और हमको भूख लग रही है। जल्दी बोलो उसको यार आने को।”

“एक मिनट यार, एक मिनट। वो देखो, ब्लू कलर का कुछ नज़र आया। वो है राशि।”

“अच्छा, बलु है तुम्हारी राशि”। चिढ़ाते हुए दिनाक ने बोला।

सुगम के चेहरे पे हँसी की एक लम्बी लकीर खींच गयी।

राशि सामने आकर खड़ी हो गयी।

कैन्वस जुते, ब्लू कलर की टी शर्ट, और काली जींस, यहीं तो थी राशि।

रोज़ रोज़ वाली

मुझे मिलना था तुमसे आज। अंकुर के आवाज से उसके अंदर के रोष का पता चल रहा था।

नहीं आ पाई मैं, वो आज मेरा पेट बहुत दुःख रहा था। रीता का पेट दुःख रहा था या नहीं वो तो रीता जाने लेकिन दर्द तो था कुछ।

रहने दो, जब बाहर मिलना होता है तो कोई पेट में ऐंठन नहीं होती लेकिन जब घर आने को बोलता हूँ तो सौ बहाने।

फ़ोन रख दिया गया। रीता ने भी फ़ोन नीचे कर दिया।

पिछले बार का निशान अब तक नहीं गया है उसके बायें स्तन से। अनजाने में हाथ सीने पर चला गया। दर्द तो नहीं है लेकिन अभी भी ज़ख़्म हरा है।

सात महीने पहले मिली थी अंकुर से। अच्छा लगा था उसके साथ घुमना। फिर एक दिन कार पार्किंग में अंधेरे की वजह से रीता ने अंकुर को किस्स कर लिया।

वो अभी प्यार में नहीं थी लेकिन कोशिश में थी। फिर एक दिन घर आने का निमन्त्रण आया और रीता चली गयी।

अगले दिन सुबह जब अपने घर आयी तो रीता, रीता हो चुकी थी। उसी की ग़लती थी जो पहला क़दम उठाया।

लेकिन अब क्या हो सकता था।

मुझे नहीं अच्छा लगता ये सेक्स करना। रीता ने रोका लेकिन जवाब आया- जबतक करोगी नहीं तबतक अच्छा कैसे लगेगा?

नहीं अच्छा लगा मुझे अंकुर। मैं नहीं करना चाहती कभी भी।

अरे एक बार में सबको दिक़्क़त होती है। तुम कोई रोज़ रोज़ वाली नहीं हो इसीलिए तो मुझे अच्छा लगा। अंकुर की शक्ल अलग थी। किसी तरह का ग़ुरूर था चेहरे पर।

“रोज़ रोज़ वाली नहीं हो तुम”

रीता ने अपनी यादों पर लगाम लगाया और फ़ोन मिलाया।

हेलो अंकुर, मैं तुमसे अब नहीं मिलना चाहती। कभी भी नहीं।

क्यूँ क्या किया अब मैंने?

बहुत कुछ किया लेकिन अब मैं नहीं करना चाहती कुछ।

ओह मन भर गया! तुम्हारा मुझे पता था। पहले किस्स किया और जब मज़ा नहीं आया तो छोड़ दिया।

हाँ, नहीं आया मज़ा मुझे।

“तुम मेरे लिए रोज़ रोज़ वाले ही निकले।”

Kashmiriyat

“Where are you going from middle of the class?”
“Sir, I was thinking to go home. I ain’t feeling good.” Radhika told a plain lie.
“What happened to you?” Abdul sir asked her with a puzzled face.
“You were good in previous class. I think you are taking upcoming debate lightly.”
“Oh, that Kashmir- Liberation from opperssion. I am upto it. Don’t worry.” She looked so confident.
“Ok go but how will you go.?”
Kashmir College of Arts was far away from Daroja. It took 1 hour to come for Radhika. But she did come, everyday.
“I called home for car.”
She went off from the class. Actually, she was not going home. She was going to pick Rafiq, his best friend. After all he was coming with all statics of her video. She was ready to compile a new song with him. However, Rafiq didn’t know much about camera but for his Aka, he had to do it.
She was about to enter into her car, suddenly she heard some argument coming from outside of the college gate.
“Uncle, give me a minute.” She told her car driver and moved forward to see.
She saw a 8 years old girl was arguing with some boys where like 16-18 years. She saw boys pushed her a side after some seconds.
“Hey, stop it guys. What is going on there?”
She saw boys ran out from there. She went to the girl and patted on her shoulder.
“What happened?”
“They were telling me to pelt stone over there.” She directed towards her Radhika’s car.
“why?” She was astonished. Why someone would do this.
“I don’t know. They hit me after I told no.”
“Okay go home now. Should I drop you?”
“No, I can go by myself.”
Radhika sat inside her car on driver’s seat and told her driver to sit beside her. She wanted to drive. But still she had the question- why on my car?
Finally, she reached at her destination, the Daroja bus stand.
“Hello, where are you dog?”
“I am about to reach.”
“I am waiting at stand now. Hurry up.”
Now, she took out her notepad and wrote- ‘Liberation from oppression’.
Kashmir is our home. Kashmir is in our soul. Other than Insaniyat (humanity), Kashmiriyat is what we have got. We have seen slavery, we have seen atrocities, we have seen murders. Now we need Salvation. We are on the verge of becoming a body with soul. Without Kashmir, we are nothing. I, myself Radhika Mirza..
“Hey, Aka.”
“Rafiq, you dog.” She ran towards him to hug him so tight. After a long period of time, she felt presence of a human. She was enjoying the moment. She didn’t want to let him go. She was with him now. Her best friend.

माफ़ कीजियेगा

माफ़ कीजियेगा इस पोस्ट के लिए थोड़ी बेहूदा भाषा में लिखी हुई है
लेकिन क्या फ़र्क़ पड़ता है मेरे लिखने से| Character Judgement तो दो मिनट में दे कर निकल लेंगे देश के राष्ट्रवादी गायक “अभिजीत” की तरह| मतलब अखंड बेहूदा इंसान है, इतना बेहूदा इंसान है ये कि इसकी बेहूदगी देख कर लगता है इसके माँ- बाप ने भी दो बार सोचा होगा- किया जाए या न किया जाए?
मतलब जिसने इतने सुरीले गाने गाये हो उसके दिमाग में इतना जहरीला कीड़ा कैसे पनप सकता है लेकिन इसको देख कर लगता है सुरीली आवाज़ उस वक़्त इसीलिए निकल रही थी क्योंकि कीड़ा बहुत छोटा था और अब बड़ा हो कर कहीं से बाहर निकलने की कोशिश में लगा हुआ है|
अब जरा बात करते हैं परेश रावल की| कहते हैं हैं जब अच्छा एक्टर/ कलाकार किसी किरदार में दिलोदिमाग से घुस जाता है वो वैसा ही बन जाता है और परेश रावल को देख कर लगता है इसने रेपिस्ट और भांड का किरदार बहुत दिल से निभाया था तभी आज ऐसे बोल निकल रहे हैं |
इसकी घटिया बात सुन कर लोग कह रहे हैं- गलती अरुंधति रॉय की है| जब वो ऐसा बोल सकती है तो परेश जी भी बोल सकते हैं उन्हें जीप में बांधने को|
तब मुझे लगता है अच्छा गधों के बच्चों, तो हमने परेश रावल को इसीलिए वोट दिया था ताकि वो किसी की भी बात पर उसको जीप से बांधने की वकालत करे| धन्य हो अच्छा है तुम सब गधों के बच्चें हो और हम बंदरों के|
जब गधों की बात की है तो नरेंद्र मोदी जो की सबसे बड़े गधे हैं मतलब हत्यारे गधे हैं उन्हें भूल नहीं सकती|
Manchester में 19 लोगो के मरने पर धड़धड़ कर के ट्विटर पर शोक व्यक्त कर दिया लेकिन खुद के यहाँ रोजाना लोग मर रहे हैं उसपे क्या हाथों में कोढ़ लग जाता हैं| हद घनचक्कर इंसान है अपना प्रधानमंत्री|
“मैंने बहुत बहुत बड़े लोगो से दुश्मनी मोल ली है|’
अरे भाई कौन हैं ये बड़े लोग? खुद तो गधे से प्रेरणा लेते हो और पूरी दुनिया को गधा बनाने में लगे हो| तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली आकर प्रदर्शन किया उस पर बोलने में मुँह में कनपुरिया पान चबा कर बैठे थे जो बोल नहीं सकते थे और वहां श्रीलंका में जाकर बकर बकर कर दिया तमिल किसानों पर| दे दो न तमिल श्रीलंका को जब श्रीलंका में ही जाकर बोलना था थारे को|
दिमाग का दही कर दिया है इस बतख पार्टी ने| शर्म करो बाबा कुछ तो शर्म करो|
मत करना वैसे वो भी जाने क्या बोल कर करोगे|

Pradhyut, the southy

‘Amma, I love you this much.’ Pradhyut hugged her mother.
Today, Jayanthi Rangnathan was so proud of her son. He finally recruited in Madras Regiment. This was his last day with her and he didn’t want to leave her. She cooked his favorite dosa with tamarind soaked sambhar, his son’s favourite.
“Jaya, our baby would become a great person.” Raman was caressing Jayathi’s head.
“What we are going to name him? A great person?”, Jayathi giggled on Raman’s words.
“Pradhyut”.
‘Pradhyut Jayathiraman- Son of Jayathi and Raman.
‘Amma, bye bye’, Pradhyut screaming at his loudest. His heart was screaming too- Mother, don’t let me go.
He sat down on his seat in train which was going straight to Kashmir. His first posting was in Kashmir. He checked his bag for his camera. He didn’t want to lose it as it was given by his beloved mother.
‘Buddy, you got a DSLR?’ one of the batchmate asked him.
‘Yeah, I love to take pictures.’ He replied.
‘Yeah, you can take pictures of rotten bodies of traitors.’ He started laguhing in so scary manner.
‘Why are you saying like this?’
‘So what should I say? You are not going for some fucking honeymoon with your wife, you Southy.’ He started bullied him now.

Pradhyut didn’t try to reply him back because he was used to these kind of comments. He knew they were jealous from his DSLR. He changed his seat as he couldn’t change his coach.
HIs train was 5 hours late. At last, train started to rolling and running slowly on tracks. He started looking outside. He wanted to look at the beautiful city as he never got a chance to saw it. It was really beautiful and now it was making hard for him to leave it behind.
‘What Madras battalion says- Veera Madrasi, adi kollu, adi kollu (brave Madrasi, hit and kill, hit and kill)’. He was remebering his mother. She was more than a mother. She was a battalion in herself actually.
She was in love with her nation that if war happens she could alone kill everyone. But still everyone mocks me and her by calling southy.
He got tears in his eyes by imagining his mother alone in home.
He couldn’t help this. Now it’s late.