‘अरे हमें चाहिए आज़ादी’

‘अरे हमें चाहिए आज़ादी’
आज़ादी, आज़ादी।

क्या दिक्कत है “आज़ादी” शब्द से लोगों को?
‘बस्तर को चाहिए आज़ादी’।
‘कश्मीर को चाहिए आज़ादी’।
‘मुझे भी चाहिए आज़ादी’।

एक बार तो जाइये बस्तर जरा देखने की किस आज़ादी की बात हो रही है। एक बार जरा जाइये कश्मीर देखने की किस बात की मांग हो रही है?
लेकिन नहीं आपको तो बस एक रटी-रटाई बात तोते की तरह आलापे जा रहे हैं। आज से सत्तर साल पहले जब गोरों से लड़ाई छिड़ी थी तो लोग आज़ादी की ही मांग कर रहे थे।
उस वक़्त भी आज़ादी का मतलब था स्वाधीनता की लड़ाई और आज की भी आज़ादी का मतलब है स्वाधीनता की लड़ाई।
कहाँ है आज़ादी?

बोलने की आज़ादी देकर कहते हो- “भाई देखो अगर इस देश में रहना है तो बस ये चार लाइन याद रखो वरना मुँह बंद रखो।”
देखने की आज़ादी देकर कहते हो ‘ ” भाई ये वाला version हमारे देश का कल्चर नहीं है , हम इसपे कैंची चला रहे हैं”।
पढ़ने की आज़ादी देकर कहते हो – ” भाई 99 percent कट ऑफ लाओ वरना बड़े कॉलेज में दाखिला नहीं मिलेगा।”
सवाल पूछने की आज़ादी देकर कहते हो- ” भाई सेना के जवानों पर सवाल नहीं करना, हमारे देश के प्रधान मंत्री पर सवाल नहीं करना बाकि और भी लंबी लिस्ट ला देते हो’।

तो बताओ कहाँ है आज़ादी? क्यों नहीं मांगे कोई आज़ादी?
पाकिस्तान को अच्छा कहने पर, उनके लोगों को Facebook पर शामिल करने पर हमें राष्ट्रद्रोही कहो तुम और पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने के नाम पर भी diplomacy करो तुम।
फिर क्यों न मांगे हम आज़ादी?

लेकिन गलती हमारी है। हमने अनपढ़, फ़र्ज़ी डिग्री वालों को अपना नेता चुना। हमने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी।
हमें कहाँ पता था कि देश को अपनी माँ बताने वाला इंसान देश के लिए जान देने वाला इंसान एक दिन संसद में पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित न करने की वकालत करेगा।

अगर ये देश ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन ये देश कहेगा ज़नाब – भारत को चाहिए आज़ादी।

अरे आज़ादी आज़ादी, हमें चाहिए आज़ादी।
अरे हम क्या चाहते -आज़ादी।
पहले लिया था गोरों से, अब चाहिए इन चोरों से
कह के लेंगे हम आज़ादी, आज़ाद देश का नारा है ये
तुम जितना लड़ लो, हम लेकर रहेंगे आज़ादी।
आरक्षण से आज़ादी, मनुवाद से आज़ादी
मोहन भागवत से आज़ादी, तुम्हारी डिप्लोमेसी से आज़ादी
अशिक्षा से आज़ादी, गलत कानूनों से आज़ादी।

बहुत सारे लोगों के पल्ले नहीं पड़ने वाला ये सब। न पड़े कोई फ़र्क़ नहीं।

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